श्री विष्णूची आरती
जय श्रीधरा
जय देव जय देव जय श्रीधरा ।
आरती ओवाळू चरणी ठेवूनियाS शिरा ॥धृ.॥
करुणासिंधु अमितविक्रमी तू जगदीश्वरा ।
भक्तांलागीं पावसी हे ब्रीद तुझे साच खरा ॥ १ ॥
कमळापति कमळाक्ष तू कमळावरद ।
कमळनाभ कमळासन वंदिती सुरसिद्ध ॥२॥
शंख चक्र गदा पद्म आयुधे ही चारी ।
गरुडावरि आरूढ होऊनिया निवारी सारी ॥३॥
व्यापक विश्वंभर तूं सर्वांचा नियंता ।
तुजविण या जगांत दुजा नाही कोणी त्राता ॥४॥
दास म्हणे स्वामी तू माझा प्रतिपाळ ।
अखंड तुझे नाम स्मरो मज सर्वकाळ ॥५॥
------------------------------------------------------------------
आवडी गंगाजळे
आवडी गंगाजळे देवा न्हाणीलें। देवा न्हाणीलें। भक्तीचे भूषण प्रेमासुगंध अर्पिले ॥१॥
अहं हा धूप जाळू श्रीहरीपुढे। श्रीहरीपुढे। जव जव धूप जळे। तव तव देवा आवडे ॥२॥
रमावल्लभदास त्याने धूप जाळिला। दीप लाविला। एकारतीचा मग प्रारंभ केला ॥३॥
सोहं हा दीप ओवाळू गोविंदा। समाधी लागली पाहता मुखारविंदा ॥४॥
हरीख हरीख होतो मुख पाहता। चाकाटल्या ह्या नारी सर्वही अवस्था ॥५॥
सद्भावालागी बहु हा देव भुकेला। रमावल्लभदासे नैवेद्य अर्पिला ॥६॥
फल तांबूल दक्षिणा अर्पीली। तया उपरी नीरांजने मांडिली ॥७॥
आरती आरती करू गोपाळा। मी तू पण सांडोनी वेळोवेळा ॥८॥
पंचप्राण पंचज्योती आरती उजळिली। दृश्य हे लोपले तथा प्रकाशांतळी ॥९॥
आरतीप्रकाशे चंद्र सूर्य लोपलें। सुरवर सकळीक तटस्थ ठेले ॥१०॥
देवभक्तपण न दिसे कांही। ऐशापरी दास रमावल्लभ पायी ॥११॥
------------------------------------------------------------------
ॐ जय जगदीश हरे (आरती)
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे ।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥ ॐ जय... ॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का ।
स्वामी दुःख बिनसे मन का ।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ॥ १ ॥ ॐ जय... ॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी ।
स्वामी शरण गहूँ किसकी ।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी ॥ २ ॥ ॐ जय... ॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी ।
स्वामी तुम अन्तर्यामी ।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी ॥ ३ ॥ ॐ जय... ॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता ।
स्वामी तुम पालनकर्ता ।
मैं मूरख खलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता ॥ ४ ॥ ॐ जय... ॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति ।
स्वामी सबके प्राणपति ।
किस विधि मिलूँ दयामय, किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति ॥ ५ ॥ ॐ जय... ॥
दीनबन्धु दुःखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे ।
स्वामी तुम रक्षक मेरे ।
अपने हाथ उठाओ, अपनी शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे ॥ ६ ॥ ॐ जय... ॥
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा ।
स्वामी पाप हरो देवा ।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा ॥ ७ ॥ ॐ जय... ॥
तन-मन-धन सब कुछ है तेरा ।
स्वामी सब कुछ है तेरा ।
तेरा तुझको अर्पण, तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा ॥ ८ ॥ ॐ जय... ॥